Sunday, 27 January 2013

ग़ज़ल 6 7 ( सच जो कहने लगा हूँ मैं )

सच जो कहने लगा हूं मैं - लोक सेतिया "तनहा"

सच जो कहने लगा हूं मैं ,
सबको लगता बुरा हूं मैं।

अब है जंज़ीर पैरों में ,
पर कभी खुद चला हूं मैं।

बंद था घर का दरवाज़ा ,
जब कभी घर गया हूं मैं।

अब सुनाओ मुझे लोरी ,
रात भर का जगा हूं मैं।

अब नहीं लौटना मुझको ,
छोड़ कर सब चला हूं मैं।

आप मत उससे मिलवाना ,
ज़िंदगी से डरा हूं मैं।

सोच कर मैं ये हैरां हूं ,
कैसे "तनहा" जिया हूं मैं।

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