Thursday, 10 January 2013

ग़ज़ल 118 ( रुलाता सब जमाना है , हमें रोना नहीं आता ) - लोक सेतिया "तनहा"

 रुलाता सब ज़माना है , हमें रोना नहीं आता - लोक सेतिया "तनहा"

रुलाता सब ज़माना है , हमें रोना नहीं आता ,
हमें अश्कों से अपने दर्द सब धोना नहीं आता।

सिखा जाना कभी आकर दिलों को जीतते कैसे ,
हमें सब और है आता , यही टोना नहीं आता।

बढ़ाते जा रहे हैं सब कतारें खुद गुनाहों की ,
न बांधो पाप की गठड़ी अगर ढोना नहीं आता।

यहां पर आंधियां चलती बहुत ज़ालिम ज़माने की ,
तुम्हें लेकिन संभल कर खुद खड़े होना नहीं आता।

सभी कांटे हमें देना , उन्हीं को फूल दे देना ,
ख़ुशी का बीज जीवन में , जिन्हें बोना नहीं आता।

हमेशा मांगते रहते , मगर कैसे मिले कुछ भी ,
जिन्हें पाना तो आता है , मगर खोना नहीं आता।

चले आये हैं महफ़िल में , बिताने रात इक अपनी ,
अकेले रात भर "तनहा" हमें सोना नहीं आता।

No comments: