Thursday, 24 January 2013

ग़ज़ल 1 2 7 ( दोस्त अपने हमें बुला न सके ) - लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त अपने हमें बुला न सके - लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त अपने हमें बुला न सके ,
हम भी गैरों के पास जा न सके।

प्यार तो प्यार है इबादत है ,
पर सभी ये सबक पढ़ा न सके।

जो कभी साथ साथ गाये थे ,
हम ख़ुशी के वो गीत गा न सके।

आप करते गये सितम पे सितम ,
हम लबों तक भी बात ला न सके।

कह रहा है हमें ज़माना भी ,
सीख जीने की तुम अदा न सके।

मत कभी रूठ कर चले जाना ,
हम  किसी को कभी मना न सके।

तुम हमें दे गये कसम "तनहा" ,
अश्क हम चाह कर बहा न सके।

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