Thursday, 24 January 2013

ग़ज़ल 1 2 5 ( दोस्ती इस तरह निभाते हैं )

दोस्ती इस तरह निभाते हैं

दोस्ती इस तरह निभाते हैं ,
रूठ जाते कभी मनाते हैं।

रोज़  घर पर हमें बुलाते हैं ,
दर से अपने कभी उठाते हैं।

वो कहानी हुई पुरानी अब ,
इक नई दास्तां सुनाते हैं।

रात आते नज़र सितारे भी ,
और जुगनू भी टिमटिमाते हैं।

लोग मिलते नहीं कभी खुद से ,
आज तुम से तुम्हें मिलाते हैं।

मंज़िलें पास पास लगती हैं ,
बोझ मिलकर अगर उठाते हैं।

जब भी "तनहा" उदास होते हैं ,
दीप आशा के कुछ जलाते हैं।

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