Tuesday, 8 January 2013

ग़ज़ल 1 1 3 ( इन अंधेरों को मिटाता कोई ) - लोक सेतिया "तनहा"

इन अंधेरों को मिटाता कोई - लोक सेतिया "तनहा"

इन अंधेरों को मिटाता कोई ,
अब चिरागों को जलाता कोई।

राह से भटके मुसाफिर सब हैं ,
रास्ता किसको बताता कोई।

कारवां कोई नज़र आ जाता ,
हमको मंज़िल से मिलाता कोई।

शब गुज़र जाती जिसे सुन कर के ,
इक कहानी तो सुनाता कोई।

की खता हमने , कभी तुमने की ,
अब गिले शिकवे भुलाता कोई।

क्यों झुका आंखें वहां जाते हम ,
दाग़ अपने जो मिटाता कोई।

मौत से "तनहा" कहां डरते हैं ,
ज़हर आकर खुद पिलाता कोई। 

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