Thursday, 6 December 2012

ग़ज़ल 9 ( आपके किस्से पुराने हैं बहुत )

आपके किस्से पुराने हैं बहुत ,
सुन रखे ऐसे फसाने हैं बहुत !
बेमुरव्वत तुम अकेले ही नहीं ,
आजकल के दोस्ताने हैं बहुत !
वक़्त को कोई बदल पाया नहीं ,
वक़्त ने बदले ज़माने हैं बहुत !
हो गये दो जिस्म यूं तो एक जां ,
फासले अब भी मिटाने हैं बहुत !
दब गये ज़ख्मों की सौगातों से हम ,
और भी अहसां उठाने हैं बहुत !
मिल न पाये ज़िंदगी के काफ़िये ,
शेर लिख लिख कर मिटाने हैं बहुत !
फिर नहीं शायद कभी मिल पायेंगे  ,
आज "तनहा" पल सुहाने हैं बहुत !
 

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