Saturday, 29 December 2012

ग़ज़ल 7 6 ( नहीं कभी रौशन नजारों की बात करते हैं )

नहीं कभी रौशन नज़ारों की बात करते हैं ,
जो टूट जाते उन सितारों की बात करते हैं !
हैं कर रही बरबादियां हर तरफ रक्स लेकिन ,
चलो खिज़ाओं से बहारों की बात करते हैं !
वो लोग सच को झूठ साबित किया करें बेशक ,
जो रोज़ आ के हमसे नारों की बात करते हैं !
वो जानते हैं हुस्न वालों की हर हकीकत को ,
उन्हीं के कुछ टूटे करारों की बात करते हैं !
गुलों से करते थे कभी गुफ्तगू बहारों की ,
जो बागबां खुद आज खारों की बात करते हैं !
हुआ हमारे साथ क्या है ,किसे बतायें अब ,
सभी तो नज़रों के इशारों की बात करते हैं !
जिसे नहीं आया अभी तक ज़मीं पे चलना ही ,
वही ज़माने के सहारों की बात करते हैं !
जो नाखुदा कश्ती को मझधार में डुबोते हैं ,
उन्हीं से "तनहा" क्यों किनारों की बात करते हैं !

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