Tuesday, 18 December 2012

ग़ज़ल 1 6 8 ( जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर )

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ,
हमारा भी इक दोस्त होगा कहीं पर !
यही काम करता रहा है ज़माना ,
किसी को उठा कर गिराना ज़मीं पर !
गिरे फूल  आंधी में जिन डालियों से  ,
नये फूल आने लगे फिर वहीं पर !
वो खुद रोज़ मिलने को आता रहा है ,
बुलाते रहे कल वो आया नहीं पर !
किसी ने लगाया है काला जो टीका ,
लगा खूबसूरत बहुत उस जबीं पर !
भरोसे का मतलब नहीं जानते जो ,
सभी को रहा है यकीं क्यों उन्हीं पर !
रखा था बचाकर बहुत देर "तनहा" ,
मगर आज दिल आ गया इक हसीं पर !

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