Friday, 14 December 2012

ग़ज़ल 1 6 7 ( दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये )

दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये  ,
और क्या चाहिये शायरी के लिये  !
उसके आंसू बहे , ज़ख्म जिसको मिले ,
कौन रोता भला अब किसी के लिये  !
जी न पाये मगर लोग जीते रहे ,
सोचते बस रहे ख़ुदकुशी के लिये  !
शहर में आ गये गांव को छोड़ कर ,
अब नहीं रास्ता वापसी के लिये  !
इस ज़माने से मांगी कभी जब ख़ुशी ,
ग़म हज़ारों दिये इक ख़ुशी के लिये  !
तब बताना हमें तुम इबादत है क्या ,
मिल गया जब खुदा बंदगी के लिये  !
आप अपने लिए जो न "तनहा" किया ,
आज वो कर दिया अजनबी के लिये  !    

No comments: