Wednesday, 5 December 2012

ग़ज़ल 1 6 6 ( कश्ती वही साहिल वही तूफाँ वही हैं )

कश्ती वही साहिल वही तूफां वही हैं ,
खुद जा रहे मझधार में नादां वही हैं !
हम आपकी खातिर ज़माना छोड़ आये  ,
दिल में हमारे अब तलक अरमां वही हैं !
कैसे जियें उनके बिना कोई बताओ ,
सांसे वही धड़कन वही दिल जां वही हैं !
सैलाब नफरत का बड़ी मुश्किल रुका था ,
आने लगे फिर से नज़र सामां वही हैं !
हालात क्यों बदले हुए आते नज़र हैं ,
जब रह रहे दुनिया में सब इन्सां वही हैं !
दामन छुड़ा कर दर्द से कुछ चैन पाया ,
फिर आ गये वापस सभी महमां वही हैं !
करने लगे जो इश्क आज़ादी से "तनहा" ,
इस वतन पर होते रहे कुरबां वही हैं !

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