Thursday, 27 December 2012

ग़ज़ल 1 0 4 ( जब हुई दर्द से जान पहचान है )

जब हुई दर्द से जान पहचान है ,
ज़िंदगी तब हुई कुछ तो आसान है !
क़त्ल होने लगे धर्म के नाम पर ,
मुस्कुराने लगा देख हैवान है !
कुछ हमारा नहीं पास बाकी रहा ,
दिल भी है आपका आपकी जान है !
चार दिन ही रहेगी ये सारी चमक ,
लग रही जो सभी को बड़ी शान है !
लोग अब ज़हर को कह रहे हैं दवा ,
मौत का ज़िंदगी आप सामान है !
उम्र भर कारवां जो बनाता रहा ,
रह गया खुद अकेला वो इंसान है !
हम हुए आपके, आके "तनहा" कहें ,
बस अधूरा यही एक अरमान है !   

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