Saturday, 22 December 2012

ग़ज़ल 9 9 ( उसको न करना परेशान ज़िंदगी )

 उसको न करना परेशान ज़िंदगी - लोक सेतिया "तनहा" 

उसको न करना परेशान ज़िंदगी ,
टूटे हुए जिसके अरमान ज़िंदगी।

होने लगा प्यार हमको किसी से जब ,
करने लगे लोग बदनाम ज़िंदगी।

ढूंढी ख़ुशी पर मिले दर्द सब वहां ,
जायें किधर लोग नादान ज़िंदगी।

रहने को सब साथ रहते रहे मगर ,
इक दूसरे से हैं अनजान ज़िंदगी।

होती रही बात ईमान की मगर ,
आया नज़र पर न ईमान ज़िंदगी।

सब ज़हर पीने लगे जान बूझ कर ,
होने लगी देख हैरान ज़िंदगी।

शिकवा गिला और "तनहा" न कर अभी ,
बस चार दिन अब है महमान ज़िंदगी। 

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