Friday, 28 December 2012

ग़ज़ल 1 6 9 ( बहाने अश्क जब बिसमिल आये ) - लोक सेतिया "तनहा"

बहाने अश्क जब बिसमिल आये - लोक सेतिया "तनहा"

बहाने अश्क जब बिसमिल आये  ,
सभी कहने लगे पागल आये।

हुई इंसाफ की बातें लेकिन ,
ले के खाली सभी आंचल आये।

सभी के दर्द को अपना समझो ,
तुम्हारी आंख में भर जल आये।

किसी की मौत का पसरा मातम ,
वहां सब लोग खुद चल चल आये।

भला होती यहां बारिश कैसे ,
थे खुद प्यासे जो भी बादल आये।

कहां सरकार के बहते आंसू ,
निभाने रस्म बस दो पल आये।

संभल के पांव को रखना "तनहा" ,
कहीं सत्ता की जब दलदल आये।

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