Thursday, 1 November 2012

हवाओं को महका दो ( नज़्म ) 3 8 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

हवाओं को महका दो ,
फज़ाओं को बतला दो !
बरसती रहें शब भर ,
घटाओं को समझा दो !
उठा कर के घूंघट को ,
ज़रा सा तो सरका दो !
तुम्हें देखता रहता ,
ये दर्पण भी हटवा दो !
खुली छोड़ कर जुल्फें ,
हमें आज बहका दो !
हमें तुम कभी "तनहा" ,
किसी से तो मिलवा दो !

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