Sunday, 4 November 2012

मैं ( नज़्म ) शून्य भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मैं कौन हूं ,
न देखा कभी किसी ने //
मुझे क्या करना है ,
न पूछा ये भी किसी ने //
उन्हें सुधारना है मुझको ,
बस यही कहा हर किसी ने !!
और सुधारते रहे ,
मां-बाप कभी गुरुजन //
नहीं सुधार पाए हों दोस्त या कि दुश्मन //
चाहा सुधारना पत्नी ने और मेरे बच्चों ने //
बड़े जतन किए उन सब अच्छों ने //
बांधते रहे रिश्तों के सारे ही बंधन //
बनाना चाहते थे मिट्टी को वो चन्दन //
इस पर होती रही बस तकरार //
मानी नहीं दोनों ने अपनी हार //
सोच लिया मैंने ,
जो कहते हैं सभी //
गलत हूंगा मैं ,
वो सब ही होंगें सही //
चाहा भी तो कुछ कर न सका मैं //
सुधरता रहा ,
पर सुधर सका न मैं !!
बिगड़ा मैं कितना
कितनी बिगड़ी मेरी तकदीर //
कितने जन्म लगेंगें ,
बदलने को मेरी तस्वीर //
जैसा चाहते हैं सब ,
वैसा तभी तो मैं बन पाऊं //
पहले जैसा हूं ,
खत्म तो हो जाऊं //
मुझे खुद मिटा डालो ,
यही मेरे यार करो //
मेरे मरने का वर्ना
कुछ इंतज़ार करो !!

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