Thursday, 8 November 2012

झूठा है दर्पण ( कविता ) 7 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

किया सम्मानित ,
सरकार ने ,
साहित्यकार को ,
और दे दी गई ,
इक स्वर्ण जड़ित ,
कलम भी ,
सम्मान राशि के साथ !
रुक जाता ,
लिखते लिखते ,
उनका हाथ ,
जब भी चाहते ,
लिखना वो ,
जनता के दुःख दर्द की ,
कोई बात !
शायद इसलिये  ,
या फिर अनजाने में ही ,
मुझे भेज दी ,
उन्होंने वही कलम ,
शुभकामना के साथ !
देखा भीतर से ,
जब कलम को ,
लगे कांपने मेरे भी हाथ ,
आया नज़र ,
स्याही की जगह लहू ,
डरा गई मुझको ये बात !
ऐसी ही कलमें ,
आजकल लिख रहीं हैं  ,
नित नया नया इतिहास ,
गरीबों के खून के छींटे  ,
आ रहे नज़र ,
उनके दामन पर ,
जो करते तो हैं ,
देशसेवा की बातें  ,
कर रहे हर दिन ,
जनता का धन बर्बाद ! !
आयोजित करते ,
आडम्बरों के समारोह  ,
प्रतिदिन शान दिखाने ,
दिल बहलाने को ,
नहीं कर पाते ,
वो लोग कभी ,
गरीबों के दुःख दर्द का ,
कोई एहसास ! !
करते जिन की हैं बातें ,
उन भूखे नंगों का ,
कर रहे ये कैसा उपहास ! !
कौन दिखाये ,
दर्पण उनको ,
कौन लगाये ,
उन पर कोई आरोप ,
जब शामिल हैं ,
इनमें ,
समाज को ,
आईना दिखाने वाले ,
अपनी सूरत ,
देखें कैसे दर्पण में ,
और कैसे सब को दिखायें ,
सरकारी सम्मानों का ,
क्या है सच ,
वो हमें कैसे खुद बतायें  !! 

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