Wednesday, 7 November 2012

जीने का अधिकार मिले ( कविता ) शून्य ( डॉ लोक सेतिया )

कोई आस्तिक हो ,
या हो नास्तिक ,
ईश्वर के लिये  ,
सभी हों एक समान ,
होना ही चाहिये  ,
दुनिया का सिर्फ यही विधान !
नहीं जानता मैं क्या हूं ,
आस्तिक या कि नास्तिक ,
शायद नहीं आता मुझको,
करना विनती- प्रार्थना ,
गुलामी करना नहीं भाता मुझे  ,
किसी को गुलाम बनाना ,
भी नहीं चाहता हूं मैं ,
हम सब हैं बराबर जब इंसान ,
किसी का किसी पर ,
नहीं जब कोई एहसान ,
क्यों  होता है  ऐसा फिर भगवान  ,
बेबस ही लगता क्यों  ,
यहां  हर इक इंसान !
चाहता हूं मैं ,
सिर्फ जीने का अधिकार ,
कोई किसी का भी  भक्त नहीं हो  ,
कोई न हो किसी की  सरकार ,
मिले जीने की पूरी कभी तो आज़ादी  ,
आरज़ू है अभी तक ,
बाकी यही आधी ,
सौ साल नहीं ,
उम्र हो चाहे बस इक साल  ,
ज़िंदगी का पर  ,
न हो बुरा ऐसा तो हाल ,
जीना है मुझको अपनी मर्ज़ी से  ,
नहीं और जीना ,
जैसा चाहते हों लोग सारे ,
मर मर कर  ही  ,
अब तक ज़िंदा रहा हूं  ,
कहां एक पल भी जी सका मैं ,
हद हो चुकी है  ,
ज़ुल्मों सितम की  ,
नहीं भीख भी चाहिये  ,
पर तेरे करम की ,
क्यों किसी को ,
अपना मालिक सब मानें  ,
कभी खुद को इंसान  ,
इंसान ही सिर्फ माने  ,
किसी के आदेश से ,
न हो जीना मरना  ,
अगर कर सको ,
अब यही बस तुम करना !!
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(  भगवान बनना मुश्किल बहुत है //
नहीं आसां मगर इन्सान भी बनना //
कभी तू भी मुझ सा ही बनना !!  )

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