Monday, 12 November 2012

ग़ज़ल 1 3 7 ( नहीं आफताब चाँद तारे नहीं हैं )

नहीं आफ़ताब चांद तारे नहीं हैं ,
कहीं ढूंढते मगर सहारे नहीं हैं !
रुकेगा नहीं कभी सफीना हमारा ,
हमें मिल सके अभी किनारे नहीं हैं !
हमारी नहीं उन्हें ज़रूरत ही कोई ,
हां हम वालदैन के दुलारे नहीं हैं !
छुपाना नहीं कभी उसे सब बताना ,
तुम्हारे हुए मगर तुम्हारे नहीं हैं !
वही आसमां भी है ,वही है ज़मीं भी ,
चमकते हुए वही सितारे नहीं हैं !
न हाथों में तीर है ,न शमशीर कोई ,
लड़ेंगे मगर अभी तो हारे नहीं हैं !
उन्हें दोस्तों ने मार डाला है "तनहा" ,
रकीबों की चाल के वो मारे नहीं हैं !

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