Sunday, 11 November 2012

ग़ज़ल 1 4 1 ( खत्म बीज करने फसल आ रही है )

ख़त्म बीज करने फसल आ रही है ,
न जाने ये कैसी नसल आ रही है !
नहीं ज़िंदगी की शिकायत करेंगे ,
हमें जब बुलाने अज़ल आ रही है !
किसी की अमानत उसी को है देनी ,
न जाये कहीं दिल फिसल आ रही है !
उसे याद अब तक है मिलने का वादा ,
वो वादा निभाने को कल आ रही है !
सभी ख़्वाब देखें ,हक़ीकत न देखें ,
सियासत बताने ये हल आ रही है !
बहारों को लाने खिज़ा खुद गई है ,
रुको तुम अभी एक पल आ रही है !
सुनी और "तनहा" बहुत आज रोये ,
बिना काफ़िये की ग़ज़ल आ रही है !

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