Monday, 19 November 2012

ग़ज़ल 1 3 9 ( हैं खुदा जो वही अब यहाँ रह रहे हैं )

हैं खुदा जो वही अब यहां रह रहे हैं ,
आदमी सब न जाने कहां रह रहे हैं !
बोलने की किसी को इजाज़त नहीं है ,
हर ज़ुबां सिल चुकी हम जहां रह रहे हैं !
ले चलो उस तरफ को जनाज़ा हमारा ,
यार सारे हमारे वहां रह रहे हैं !
लोग कहने लगे हम नहीं साथ रहते ,
तुम बता दो सभी को ,कि हां रह रहे हैं !
बाद मरने के जन्नत में जाकर ये देखा ,
हो गई भीड़ अहले जहां रह रहे हैं !
ढूंढता फिर रहा आपको है ज़माना ,
आप क्यों इस तरह बन निहां रह रहे हैं !
जुर्म साबित नहीं जब हुआ है तो "तनहा" ,
किसलिये फिर झुकाए दहां रह रहे हैं !

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