Thursday, 29 November 2012

ग़ज़ल 1 6 5 ( गाँव अपना छोड़ कर , हम पराये हो गये )

गांव  अपना छोड़ कर , हम  पराये हो गये  ,
लौट कर आए मगर बिन  बुलाये हो गये  !
जब सुबह का वक़्त था लोग कितने थे यहां ,
शाम क्या ढलने लगी ,  दूर साये हो गये  !
कर रहे तौबा थे अपने गुनाहों की मगर  ,
पाप का पानी चढ़ा फिर नहाये  हो गये  !
डायरी में लिख रखे ,पर सभी खामोश थे ,
आपने आवाज़ दी ,गीत गाये  हो गये  !
हर तरफ चर्चा सुना बेवफाई का तेरी ,
ज़िंदगी क्यों  लोग तेरे सताये  हो गये  !
इश्क वालों से सभी लोग कहने लग गये  ,
देखना गुल क्या तुम्हारे खिलाये हो गये  !
दोस्तों की दुश्मनी का नहीं "तनहा" गिला ,
बात है इतनी कि सब आज़माये  हो गये  !

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