Sunday, 4 November 2012

ग़ज़ल 1 6 0 ( दौलतों से बड़ी मुहब्बत है )

दौलतों से बड़ी मुहब्बत है ,
अब सभी की हुई ये हालत है !
बेचते हो ज़मीर तक अपना ,
देशसेवा नहीं तिजारत है !
इक तमाशा दिखा लगे कहने ,
देख लो हो चुकी बगावत है !
आईना हम किसे दिखा बैठे ,
यार करने लगा अदावत है !
आज दावा किया है ज़ालिम ने ,
उसके दम पर बची शराफत है !
दोस्त कोई कभी तो मिल जाये  ,
इक ज़रा सी यही तो हसरत है !
आप गैरों को चाहते लेकिन ,
आपसे ही हमें तो उल्फत है !
जब बुलाएं कभी ,नहीं आते ,
दूर से देखने की आदत है !
राह देखा किये वही "तनहा" ,
बदलना राह उनकी फितरत है !

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