Friday, 9 November 2012

वो साहित्य कहाँ है ( कविता ) 7 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कब का मिट चुका ,
लुट चुका ,
जिसको चाहते हैं ,
ढूंढना हम सब ,
उजड़ा उजड़ा सा है चमन ,
मुरझाये हुए हैं फूल सभी ,
रुका हुआ ,
प्रदूषित जल तालाब का ,
कुम्हलाए हुए ,
कंवल के सभी फूल ! !
हवाओं में है ,
अजब सी घुटन ,
बेचैन हो रहा ,
हमारा तन मन ,
हो रहा है जैसे मातम कोई  !
कहां गई ,
खुशियों की महफिलें ! !
कहां भूल आये  ,
सभी सदभावना ,
क्यों खो गई संवेदनाएं हमारी ,
आता नहीं अब कहीं नज़र ,
होता था कभी जो ,
अपनी पहचान ! !
सुगंध थी जिसमें फूलों की ,
महक थी जो बहारों की ,
नदी का वो बहता पानी ,
समुन्दर सी गहराई लिये ,
प्यार का सबक पढ़ाने वाला ,
मानवता की राह दिखाने वाला ,
नई रौशनी लाने वाला ,
अंधेरे सभी मिटाने वाला ,
आशा फिर से जगाने वाला ,
पढ़ने वाला ,
पढ़ाने वाला ,
साहित्य वो है कहां !!

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