Thursday, 8 November 2012

ठंडी ठंडी छाँव ( कविता ) 6 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

      ठंडी ठंडी छांव ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

घर के आंगन का वृक्ष हूं मैं ,
मेरी जड़ें गहराई तक फैली हैं ,
अपनी माटी में ,
प्यार से सालों साल सींचा है ,
माली ने पाला है जतन से ,
घर को देता हूं छाया मैं।

आये हो घर में तुम अभी अभी ,
बैठो मेरी शीतल शीतल छांव में ,
खिले हैं फूल कितने मुझ पर ,
निहारो उनको प्यार से ,
तोड़ना मत ,
मसलना नहीं ,
मेरी शाखों ,
पत्तों ,
कलियों को ,
लगेंगे फल जब इन पर ,
घर के लिये  ,
तुम्हारे लिये  ,
करो उसका अभी इंतज़ार।

काटना मत मुझे कभी भी ,
जड़ों से मेरी ,
जी नहीं सकूंगा  ,
इस ज़मीन को छोड़ कर ,
मैं कोई मनीप्लांट नहीं ,
जिसे ले जाओ चुरा कर ,
और सजा लो किसी नये गमले में।

देखो मुझ पर बना है घौसला ,
उस नन्हें परिंदे का ,
उड़ना है उसे भी खुले गगन में ,
अपने स्वार्थ के पिंजरे में ,
बंद न करना उसको ,
रहने दो आज़ाद उसको भी घर में ,
बंद पिंजरे में उसका चहचहाना ,
चहचहाना नहीं रह जायेगा ,
समझ नहीं पाओगे तुम दर्द उसका।

जब भी थक कर कभी ,
आकर बैठोगे मेरी ठंडी ठंडी छांव में ,
माँ की लोरी जैसी सुनोगे ,
इन परिंदों के चहचहाने की आवाज़ों को ,
और यहां चलती मदमाती हवा में ,
आ जाएगी तुम्हें मीठी मीठी नींद।

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