Sunday, 4 November 2012

स्वीकार करने अपने गुनाह ( नज़्म ) 6 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

  स्वीकार करने अपने गुनाह ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

स्वीकार करने हैं ,
सभी अपने गुनाह ,
तलाश करता हूं ,
ऐसी इक इबादतगाह।

मेरी ज़ुबां से सुने ,
मेरी ही दास्तां ,
बन कर के पादरी ,
जहां पर खुद खुदा।

मंज़ूर है मुझको ,
हर इक कज़ा ,
मांग लूंगा मैं ,
अपने सब जुर्मों की सज़ा।




पूछना है लेकिन ,

इक सवाल भी मुझे ,
मिलता क्या है ,
हमें रुला के तुझे।




तेरे ही बंदे ,

क्यों इतने परेशान हैं ,
हम सभी देख कर ,
हैरान हैं ,
मंदिर सब तेरे ,
बने आलीशान हैं ,
फिर किसलिये बेघर ,
इतने इंसान हैं।

बना कर ये दुनिया ,
कहां खो गया है ,
देख खोल कर आंखें ,
क्या सो गया है।

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