Thursday, 1 November 2012

मेरे खत ( कविता ) 6 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

       मेरे खत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मेरे बाद मिलेंगे तुम्हें,
मेरे ये खत मेज़ की दराज से,
शायद हो जाओ पढ़ कर हैरान ,
मत होना लेकिन परेशान।

लिखे हैं किसके नाम  ,
सोचोगे बार बार तुम,
मैं था सदा से सिर्फ तुम्हारा ,
पाओगे यही हर बार तुम।

हर खत को पढ़कर तुम तब ,
सुध बुध अपनी खोवोगे,
करोगे मन ही मन मंथन ,
और जी भर के रोवोगे।

मैंने तुमको जीवन प्रयन्त ,
किया है टूट के प्यार,
कर नहीं सका कभी भी ,
चाह कर भी मैं इज़हार।

कर लेना तुम विश्वास तब ,
मेरे इस प्यार का तुम ,
किया उम्र भर जो मैंने ,
उस इंतज़ार का तुम। 

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