Monday, 12 November 2012

विवशता ( कविता ) 4 4 डॉ लोक सेतिया

  4 4      विवशता ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

खाली है मेरा भी दामन
तुम्हारे आंचल की तरह
कुछ भी नहीं पास मेरे
तुम्हें देने को।

तुम्हारी तरह है मुझे भी
तलाश एक हमदर्द की
मेरे मन में भी है बाकी
कोई अधूरी प्यास।

ढूंढती हैं
तुम्हारी नज़रें जो मुझ में 
कहने को लरजते हैं
तुम्हारे होंट बार बार
समझता हूँ लेकिन 
समझना नहीं चाहता मैं
प्यार भरी नज़रों की
तुम्हारी उस भाषा को।

छुप सकती नहीं
मन की कोमल भावनाएं 
जानते हैं हम दोनों।

मत आना मेरे करीब तुम 
भरे हुए हैं
अनगिनत कांटे
दामन में मेरे
हैं नाज़ुक उंगलियां तुम्हारी 
कहीं चुभ न जाए
शूल कोई उनको।

किसी को देने को कोई फूल 
लाल पीला या गुलाबी 
नहीं पास मेरे।

कभी नहीं मिल पाएंगे 
हम तोड़ कर
दुनिया के सारे बंधनों को।

बस आंखों ही आंखों में 
करते रहें बात हम
ख़ामोशी से यूं ही करें 
हर दिन मुलाक़ात हम।

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