Saturday, 3 November 2012

कागज़ के फूल सजाने के ( नज़्म ) 4 0 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

कागज़ के फूल सजाने के ( नज़्म ) लोक सेतिया "तनहा"

कागज़ के फूल सजाने के ,
अंदाज़ न सीखे ज़माने के।

आये वो ,रस्म निभा के चले ,
अरमान जिन्हें थे बुलाने के।

बेबात ही हम से हैं वो खफा ,
उन के हैं ढंग सताने के।

मसरूफ थे या वादा भूले ,
अच्छे हैं बहाने , न आने के।

पत्थर दिल के ये आज सभी ,
बन बैठे खुदा बुतखाने के।

No comments: