Sunday, 4 November 2012

स्वीकार करने अपने गुनाह ( नज़्म ) 3 8 डॉ लोक सेतिया

3 8   स्वीकार करने अपने गुनाह ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

स्वीकार करने हैं
सभी अपने गुनाह
तलाश करता हूं
ऐसी इक इबादतगाह।

मेरी ज़ुबां से सुने
मेरी ही दास्तां
बन कर के पादरी
जहां पर खुद खुदा।

मंज़ूर है मुझको
हर इक कज़ा
मांग लूंगा मैं अपने
सब जुर्मों की सज़ा।

पूछना है लेकिन
इक सवाल भी मुझे
मिलता क्या है
हमें रुला के तुझे।

तेरे ही बंदे
क्यों इतने परेशान हैं
हम सभी देख कर हैरान हैं
मंदिर सब तेरे बने आलीशान हैं
फिर किसलिये बेघर इतने इंसान हैं।

बना कर ये दुनिया
कहां खो गया है
देख खोल कर आंखें
क्या सो गया है।

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