Thursday, 1 November 2012

हवाओं को महका दो ( नज़्म ) 3 8 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

हवाओं को महका दो - ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

हवाओं को महका दो ,
फज़ाओं को बतला दो।

बरसती रहें शब भर ,
घटाओं को समझा दो।

उठा कर के घूंघट को ,
ज़रा सा तो सरका दो।

तुम्हें देखता रहता ,
ये दर्पण भी हटवा दो।

खुली छोड़ कर जुल्फें ,
हमें आज बहका दो।

हमें तुम कभी "तनहा" ,
किसी से तो मिलवा दो।

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