Friday, 23 November 2012

ग़ज़ल 1 6 3 ( दूर रहते हो क्यों तुम हर किसी से ) - लोक सेतिया "तनहा"

दूर रहते हो क्यों तुम हर किसी से - लोक सेतिया "तनहा"

दूर रहते हो क्यों तुम हर किसी से ,
पास आ कर मिलो इक दिन सभी से।

पास जितना उसे तुम बांट देना ,
मांगना फिर सभी कुछ ज़िंदगी से।

कह दिया क्या उसे मरने चला है ,
देख लो हो गया क्या दिल्लगी से।

रोकना चाहते हो रोक लो अब ,
छोड़ शिकवा गिला आवारगी से।

आज नासेह से पूछा किसी ने ,
क्या खुदा मिल गया है बंदगी से।

रुक सका आज तक तूफां कभी है ,
रोकते हो मुझे क्यों आशिकी से।

जिनकी खातिर जिये "तनहा" अभी तक ,
मर गये  आज उनकी बेरुखी से। 

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