Wednesday, 21 November 2012

ग़ज़ल 1 6 2 ( फिर नये सिलसिले क्या हुए ) - लोक सेतिया "तनहा"

फिर नये सिलसिले क्या हुए - लोक सेतिया "तनहा"

फिर नये सिलसिले क्या हुए ,
सब पुराने गिले क्या हुए।

बीज बोये थे फूलों के सब  ,
गुल नहीं पर खिले क्या हुए।

इक अकेला मुसाफिर बचा ,
थे कई काफिले क्या हुए।

बात तक जब  नहीं हो सकी  ,
यार बिछुड़े मिले क्या हुए।

देखने सब उधर लग गये   ,
उनके पर्दे हिले क्या हुए।

इश्क ने तोड़ डाले सभी  ,
आपके सब किले क्या हुए।

साथ "तनहा" नहीं रह सके ,
खत्म फिर फासिले क्या हुए।

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