Sunday, 4 November 2012

ग़ज़ल 1 6 0 ( दौलतों से बड़ी मुहब्बत है ) - लोक सेतिया "तनहा"

दौलतों से बड़ी मुहब्बत है - लोक सेतिया "तनहा"

दौलतों से बड़ी मुहब्बत है ,
अब सभी की हुई ये हालत है।

बेचते हो ज़मीर तक अपना ,
देशसेवा नहीं तिजारत है।

इक तमाशा दिखा लगे कहने ,
देख लो हो चुकी बगावत है।

आईना हम किसे दिखा बैठे ,
यार करने लगा अदावत है।

आज दावा किया है ज़ालिम ने ,
उसके दम पर बची शराफत है।

दोस्त कोई कभी तो मिल जाये  ,
इक ज़रा सी यही तो हसरत है।

आप गैरों को चाहते लेकिन ,
आपसे ही हमें तो उल्फत है।

जब बुलाएं कभी ,नहीं आते ,
दूर से देखने की आदत है।

राह देखा किये वही "तनहा" ,
बदलना राह उनकी फितरत है।

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