Sunday, 11 November 2012

ग़ज़ल 1 4 1 ( खत्म बीज करने फसल आ रही है ) - लोक सेतिया "तनहा"

ख़त्म बीज करने फसल आ रही है - लोक सेतिया "तनहा"

ख़त्म बीज करने फसल आ रही है ,
न जाने ये कैसी नसल आ रही है।

नहीं ज़िंदगी की शिकायत करेंगे ,
हमें जब बुलाने अज़ल आ रही है।

किसी की अमानत उसी को है देनी ,
न जाये कहीं दिल फिसल आ रही है।

उसे याद अब तक है मिलने का वादा ,
वो वादा निभाने को कल आ रही है।

सभी ख़्वाब देखें , हक़ीकत न देखें ,
सियासत बताने ये हल आ रही है।

बहारों को लाने खिज़ा खुद गई है ,
रुको तुम अभी एक पल आ रही है।

सुनी और "तनहा" बहुत आज रोये ,
बिना काफ़िये की ग़ज़ल आ रही है।

No comments: