Monday, 19 November 2012

ग़ज़ल 1 3 8 ( मधुर सुर न जाने कहाँ खो गया है ) - लोक सेतिया "तनहा"

मधुर सुर न जाने कहां खो गया है - लोक सेतिया "तनहा"

मधुर सुर न जाने कहां खो गया है ,
यही शोर क्यों हर तरफ हो गया है।

बता दो हमें तुम उसे क्या हुआ है ,
ग़ज़लकार किस नींद में सो गया है।

घुटन सी हवा में यहां लग रही है ,
यहां रात कोई बहुत रो गया है।

नहीं कर सका दोस्ती को वो रुसवा ,
मगर दाग अपने सभी धो गया है।

करेंगे सभी याद उसको हमेशा ,
नहीं आएगा फिर अभी जो गया है।

कहां से था आया सभी को पता है ,
नहीं जानते पर किधर को गया है।

मिले शूल "तनहा" उसे ज़िंदगी से ,
यहां फूल सारे वही बो गया है।

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