Monday, 12 November 2012

ग़ज़ल 1 3 7 ( नहीं आफताब चाँद तारे नहीं हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं आफ़ताब चांद तारे नहीं हैं - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं आफ़ताब चांद तारे नहीं हैं ,
कहीं ढूंढते मगर सहारे नहीं हैं।

रुकेगा नहीं कभी सफीना हमारा ,
हमें मिल सके अभी किनारे नहीं हैं।

हमारी नहीं उन्हें ज़रूरत ही कोई ,
हां हम वालदैन के दुलारे नहीं हैं।

छुपाना नहीं कभी उसे सब बताना ,
तुम्हारे हुए मगर तुम्हारे नहीं हैं।

वही आसमां भी है ,वही है ज़मीं भी ,
चमकते हुए वही सितारे नहीं हैं।

न हाथों में तीर है ,न शमशीर कोई ,
लड़ेंगे मगर अभी तो हारे नहीं हैं।

उन्हें दोस्तों ने मार डाला है "तनहा" ,
रकीबों की चाल के वो मारे नहीं हैं।

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