Friday, 2 November 2012

गुठलियाँ नहीं आम खाओ ( व्यंग्य कविता ) 1 1 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

गुठलियां नहीं , आम खाओ ( व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

गुठलियाँ खाना छोड़ कर ,
अब आम खाओ ,
देश के गरीबो ,
मान भी जाओ।

देश की छवि बिगड़ी ,
तुम उसे बचाओ ,
भूख वाले आंकड़े ,
दुनिया से छुपाओ।

डूबा हुआ क़र्ज़ में ,
देश भी है सारा ,
आमदनी नहीं तो ,
उधार ले कर खाओ।

विदेशी निवेश को ,
कहीं से भी लाओ ,
इस गरीबी की ,
रेखा को बस मिटाओ।

मान कर बात ,
चार्वाक ऋषि की ,
क़र्ज़ लेकर सब ,
घी पिये  जाओ।

अब नहीं आता ,
साफ पानी नल में ,
मिनरल वाटर पी कर ,
सब काम चलाओ।

होना न होना ,
तुम्हारा एक समान ,
सारे जहां से अच्छा ,
गीत मिल के गाओ।

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