Thursday, 29 November 2012

ग़ज़ल 1 6 5 ( गाँव अपना छोड़ कर , हम पराये हो गये )

गांव  अपना छोड़ कर , हम  पराये हो गये  ,
लौट कर आए मगर बिन  बुलाये हो गये  !
जब सुबह का वक़्त था लोग कितने थे यहां ,
शाम क्या ढलने लगी ,  दूर साये हो गये  !
कर रहे तौबा थे अपने गुनाहों की मगर  ,
पाप का पानी चढ़ा फिर नहाये  हो गये  !
डायरी में लिख रखे ,पर सभी खामोश थे ,
आपने आवाज़ दी ,गीत गाये  हो गये  !
हर तरफ चर्चा सुना बेवफाई का तेरी ,
ज़िंदगी क्यों  लोग तेरे सताये  हो गये  !
इश्क वालों से सभी लोग कहने लग गये  ,
देखना गुल क्या तुम्हारे खिलाये हो गये  !
दोस्तों की दुश्मनी का नहीं "तनहा" गिला ,
बात है इतनी कि सब आज़माये  हो गये  !

Wednesday, 28 November 2012

ग़ज़ल 1 6 4 ( हाल अच्छा क्यों रकीबों का है )

हाल अच्छा क्यों रकीबों का है ,
ये भी शिकवा कुछ अदीबों का है !
मिल रहा सब कुछ अमीरों को क्यों ,
हक बराबर का गरीबों का है !
मांगकर मिलता नहीं छीनो अब  ,
फिर सभी अपने  नसीबों का है !
किसलिये  डरना किसी ज़ालिम से  ,
डर नहीं कोई सलीबों का है !
दर्द गैरों का दिया कुछ "तनहा" ,
और कुछ अपने हबीबों का है !

Friday, 23 November 2012

ग़ज़ल 1 6 3 ( दूर रहते हो क्यों तुम हर किसी से )

दूर रहते हो क्यों तुम हर किसी से ,
पास आ कर मिलो इक दिन सभी से !
पास जितना उसे तुम बांट देना ,
मांगना फिर सभी कुछ ज़िंदगी से !
कह दिया क्या उसे मरने चला है ,
देख लो हो गया क्या दिल्लगी से !
रोकना चाहते हो रोक लो अब ,
छोड़ शिकवा गिला आवारगी से !
आज नासेह से पूछा किसी ने ,
क्या खुदा मिल गया है बंदगी से !
रुक सका आज तक तूफां कभी है ,
रोकते हो मुझे क्यों आशिकी से !
जिनकी खातिर जिये "तनहा" अभी तक ,
मर गये  आज उनकी बेरुखी से !

Wednesday, 21 November 2012

अमर कहानी ( कविता ) 7 4 भाग दो

बेहद कठिन है ,
लिखना ,
जीवन की कहानी ,
नहीं आसान होता ,
समझना ,
जीवन को ,
करते हैं  ,
प्रतिदिन संग्राम ,
जीने के लिये  ,
कथाकार की ,
कल्पना जैसा ,
होता नहीं ,
कभी किसी का ,
जीवन वास्तव में ! !
बदलती रहती ,
पल पल परिस्थिति ,
मिलना बिछुड़ना ,
हारना जीतना ,
सुख दुःख जीवन में ,
नहीं सब होता ,
किसी के भी बस में ,
कदम कदम विवशता  ,
आती है नज़र ,
सब कुछ घटता जीवन में ,
देख नहीं पाता कोई भी ,
अनदेखा,
अनसुना भी ,
रह जाता ,
बहुत कुछ है ,
जीत जाता हारने वाला ,
और जीतने वाले ,
की हो जाती हार ,
अक्सर जाती यहां बदल,
उचित अनुचित की परिभाषा ,
किसे मालूम क्या है ,
पूर्ण सत्य जीवन का   ! !
कैसे तय कर सकती है ,
किसी कथाकार की कलम ,
नायक कौन ,
कौन खलनायक ,
जीवन में ,
कहां बच पाता लेखक भी ,
अपने पात्रों के मोह से ,
निष्पक्ष हो ,
समझना होगा ,
जीवन के पात्रों को ,
निभाना होगा ,
कर्तव्य उसे ,
जीवन की कहानी के ,
सभी पात्रों से  ,
न्याय करने का ,
उसकी कलम ,
लिख पाएगी तभी  ,
कोई कालजयी कहानी ,
जो अमर बनी  ,
रहेगी युगों युगों तक !!

ग़ज़ल 1 6 2 ( फिर नये सिलसिले क्या हुए )

फिर नये सिलसिले क्या हुए ,
सब पुराने गिले क्या हुए !
बीज बोये थे फूलों के सब  ,
गुल नहीं पर खिले क्या हुए !
इक अकेला मुसाफिर बचा ,
थे कई काफिले क्या हुए !
बात तक जब  नहीं हो सकी  ,
यार बिछुड़े मिले क्या हुए !
देखने सब उधर लग गये   ,
उनके पर्दे हिले क्या हुए !
इश्क ने तोड़ डाले सभी  ,
आपके सब किले क्या हुए !
साथ "तनहा" नहीं रह सके ,
खत्म फिर फासिले क्या हुए !

Tuesday, 20 November 2012

ग़ज़ल 1 5 2 ( बिकने लगी जब माँ करोड़ों करोड़ में )

बिकने लगी जब माँ करोड़ों करोड़ में ,
सब लोग शामिल हो गए खुद ही दौड़ में !
जीने के बारे सोचते लोग अब नहीं ,
सारा ज़माना लग गया जोड़ तोड़ में !
तुम वक़्त की रफ़्तार को रोकना नहीं ,
बचना नहीं आसान इस की मरोड़ में !
कैसे बतायें क्या लिखा क्या नहीं लिखा ,
मिलती कहां हर बात दुनिया के जोड़ में !
हम तो सभी को साथ लेते गये मगर ,
कुछ लोग खुद बिछुड़े बदल राह मोड़ में !
करने लगे हैं प्यार नेता भी देश से ,
उठने लगी हो खाज जैसे कि कोड़ में !
"तनहा" ज़माना दौड़ता और हांफता ,
शामिल  कभी होते नहीं आप होड़ में !

Monday, 19 November 2012

ग़ज़ल 1 3 9 ( हैं खुदा जो वही अब यहाँ रह रहे हैं )

हैं खुदा जो वही अब यहां रह रहे हैं ,
आदमी सब न जाने कहां रह रहे हैं !
बोलने की किसी को इजाज़त नहीं है ,
हर ज़ुबां सिल चुकी हम जहां रह रहे हैं !
ले चलो उस तरफ को जनाज़ा हमारा ,
यार सारे हमारे वहां रह रहे हैं !
लोग कहने लगे हम नहीं साथ रहते ,
तुम बता दो सभी को ,कि हां रह रहे हैं !
बाद मरने के जन्नत में जाकर ये देखा ,
हो गई भीड़ अहले जहां रह रहे हैं !
ढूंढता फिर रहा आपको है ज़माना ,
आप क्यों इस तरह बन निहां रह रहे हैं !
जुर्म साबित नहीं जब हुआ है तो "तनहा" ,
किसलिये फिर झुकाए दहां रह रहे हैं !

ग़ज़ल 1 3 8 ( मधुर सुर न जाने कहाँ खो गया है )

मधुर सुर न जाने कहां खो गया है ,
यही शोर क्यों हर तरफ हो गया है !
बता दो हमें तुम उसे क्या हुआ है ,
ग़ज़लकार किस नींद में सो गया है !
घुटन सी हवा में यहां लग रही है ,
यहां रात कोई बहुत रो गया है !
नहीं कर सका दोस्ती को वो रुसवा ,
मगर दाग अपने सभी धो गया है !
करेंगे सभी याद उसको हमेशा ,
नहीं आएगा फिर अभी जो गया है !
कहां से था आया सभी को पता है ,
नहीं जानते पर किधर को गया है !
मिले शूल "तनहा" उसे ज़िंदगी से ,
यहां फूल सारे वही बो गया है !

Friday, 16 November 2012

ग़ज़ल 1 6 1 ( बतायें तुम्हें क्या किया हमने )

बतायें तुम्हें क्या किया हमने ,
ज़माने को ठुकरा दिया हमने !
बुझी प्यास अपनी उम्र भर की ,
कोई जाम ऐसा पिया हमने !
तुझे भूल जाने की कोशिश में ,
तेरा नाम हर पल लिया हमने !
नहीं दुश्मनों से गिला करते ,
उन्हें कह दिया शुक्रिया हमने !
पुरानी ग़ज़ल को संवारा है ,
बदल कर नया काफिया हमने !
गुज़ारी है लम्बी उम्र लेकिन ,
नहीं एक लम्हा जिया हमने !
रहा अब नहीं दाग़ तक "तनहा" ,
तेरा ज़ख्म ऐसे सिया हमने !

Monday, 12 November 2012

ग़ज़ल 1 3 7 ( नहीं आफताब चाँद तारे नहीं हैं )

नहीं आफ़ताब चांद तारे नहीं हैं ,
कहीं ढूंढते मगर सहारे नहीं हैं !
रुकेगा नहीं कभी सफीना हमारा ,
हमें मिल सके अभी किनारे नहीं हैं !
हमारी नहीं उन्हें ज़रूरत ही कोई ,
हां हम वालदैन के दुलारे नहीं हैं !
छुपाना नहीं कभी उसे सब बताना ,
तुम्हारे हुए मगर तुम्हारे नहीं हैं !
वही आसमां भी है ,वही है ज़मीं भी ,
चमकते हुए वही सितारे नहीं हैं !
न हाथों में तीर है ,न शमशीर कोई ,
लड़ेंगे मगर अभी तो हारे नहीं हैं !
उन्हें दोस्तों ने मार डाला है "तनहा" ,
रकीबों की चाल के वो मारे नहीं हैं !

ग़ज़ल 1 3 6 ( इसी जहाँ में सभी का जहान होता है )

इसी जहां में सभी का जहान होता है ,
नई ज़मीन नया आसमान होता है !
वही ज़माना फिर आ गया कहीं वापस ,
कभी कभी तो हमें यूं गुमान होता है !
लिखा हुआ तो बहुत है किताब में लेकिन ,
अमल जो कर के दिखाए महान होता है !
वहीं मसल के किसी ने हैं फेंक दी कलियां ,
जहां सजा के रखा फूलदान होता है !
जो दर्द लेकर खुशियां सभी को देता हो ,
वो आदमी खुद गीता कुरान होता है !
चलो तुम्हें हम घर गांव में दिखा देंगे ,
यहां शहर में तो केवल मकान होता है !
नया परिंदा आकाश में लगा उड़ने ,
ये देखता "तनहा" खुद उड़ान होता है !

Sunday, 11 November 2012

ग़ज़ल 1 4 1 ( खत्म बीज करने फसल आ रही है )

ख़त्म बीज करने फसल आ रही है ,
न जाने ये कैसी नसल आ रही है !
नहीं ज़िंदगी की शिकायत करेंगे ,
हमें जब बुलाने अज़ल आ रही है !
किसी की अमानत उसी को है देनी ,
न जाये कहीं दिल फिसल आ रही है !
उसे याद अब तक है मिलने का वादा ,
वो वादा निभाने को कल आ रही है !
सभी ख़्वाब देखें ,हक़ीकत न देखें ,
सियासत बताने ये हल आ रही है !
बहारों को लाने खिज़ा खुद गई है ,
रुको तुम अभी एक पल आ रही है !
सुनी और "तनहा" बहुत आज रोये ,
बिना काफ़िये की ग़ज़ल आ रही है !

Saturday, 10 November 2012

मेरी खबर ( कविता ) 7 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

पहचाना नहीं ,
आज तुमने मुझे ,
तुम्हें फुर्सत नहीं थी ,
मिलने की ,
करनी थी मुझको ,
जो बातें तुमसे  ,
रहेंगी उम्र भर ,
सब अब अधूरी !!
मगर शायद ,
वर्षों बाद ,
पढ़ कर ,
सुबह का तुम अखबार ,
या सुन कर ,
किसी से  समाचार ,
आओगे घर मेरे ,
तुम भी एक बार ,
ढूंढ कर मेरा ठिकाना !!
मुमकिन है ,
सोचो तब तुम ,
कोई तो दे जाता ,
मैं तुम्हें निशानी ,
काश दोहराते ,
पुरानी हम यादें ,
सुनते-सुनाते ,
जुबां से अपनी ,
नई हम कहानी ! !
मिला है जो ,
जवाब तुमसे अभी ,
वही खुद अपने से ,
मिलेगा तुम्हें कभी ,
नहीं मिल सकूंगा मैं ! !
होगी शायद ,
तुमको भी निराशा ,
होगी खत्म तुम्हारी भी ,
मुझसे मिलने की ,
हर आशा !!
ये सब जीते जी ,
नहीं  कर सकूंगा मैं ,
जो किया है तुमने ,
वो नहीं दोहराऊंगा मैं ,
होगा ऐसा इसलिये  ,
मेरे दोस्त उस दिन ,
क्योंकि मैं ,
अलविदा ,
कह चुका हूंगा ,
दुनिया को ,
और आये होगे ,
तुम मेरे घर पर ,
पढ़कर ,
सुनकर ,
मेरे मरने की खबर !!

Friday, 9 November 2012

वो साहित्य कहाँ है ( कविता ) 7 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कब का मिट चुका ,
लुट चुका ,
जिसको चाहते हैं ,
ढूंढना हम सब ,
उजड़ा उजड़ा सा है चमन ,
मुरझाये हुए हैं फूल सभी ,
रुका हुआ ,
प्रदूषित जल तालाब का ,
कुम्हलाए हुए ,
कंवल के सभी फूल ! !
हवाओं में है ,
अजब सी घुटन ,
बेचैन हो रहा ,
हमारा तन मन ,
हो रहा है जैसे मातम कोई  !
कहां गई ,
खुशियों की महफिलें ! !
कहां भूल आये  ,
सभी सदभावना ,
क्यों खो गई संवेदनाएं हमारी ,
आता नहीं अब कहीं नज़र ,
होता था कभी जो ,
अपनी पहचान ! !
सुगंध थी जिसमें फूलों की ,
महक थी जो बहारों की ,
नदी का वो बहता पानी ,
समुन्दर सी गहराई लिये ,
प्यार का सबक पढ़ाने वाला ,
मानवता की राह दिखाने वाला ,
नई रौशनी लाने वाला ,
अंधेरे सभी मिटाने वाला ,
आशा फिर से जगाने वाला ,
पढ़ने वाला ,
पढ़ाने वाला ,
साहित्य वो है कहां !!

सुगंध प्यार की ( कविता ) 7 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सुनी हैं हीर रांझा ,
कैस लैला की ,
सबने कहानियां ,
मैंने देखा है ,
दो प्यार करने वालों को ,
खुद अपनी नज़रों से ,
कई बार अपने घर के सामने।
मज़दूरी करना ,
है उनका काम ,
पति पत्नी हैं वो दोनों ,
रहमान और अनीता ,
हैं दोनों के नाम !
पूछो मत  ,
क्या है उनका धर्म ,
देना मत ,
उनके प्यार को ,
ऐसा इल्ज़ाम !
रहमान को देखा ,
मज़दूरी करते हुए ऐसे ,
इबादत हो ,
काम करना जैसे ,
नहीं सुनी उनसे ,
प्यार की बातें कभी ,
करते हैं जैसे ,
सब लोग अक्सर कभी ! !
देखा है मैंने ,
प्यार भरी नज़रों से ,
निहारते ,
अनीता को ,
अक्सर रहमान को  ,
सुना है रहमान को ,
उसका नाम ,
पल पल पुकारते  ! !
निभाती है ,
सुबह से शाम तक ,
उसका साथ ,
न हो चाहे ,
हाथों में उसका हाथ ,
अपने पल्लू से ,
पोंछती रहती ,
उसका पसीना ,
कितना मधुर सा ,
लगता है ,
प्यार भरा एहसास !
कभी कुछ पिलाना ,
कभी कुछ खिलाना ,
कभी लेकर उससे कुदाल,
खुद चलाना ,
कभी गीत प्यार वाले ,
भी गाते नहीं ,
मुहब्बत है तुमसे ,
जताते नहीं ,
नहीं रूठते हैं ,
मनाते नहीं ,
उम्र भर साथ निभाना है ,
नहीं कहता ,
इक दूजे को कोई भी ,
जानते हैं दोनों ,
बताते नहीं !!

Thursday, 8 November 2012

झूठा है दर्पण ( कविता ) 7 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

किया सम्मानित ,
सरकार ने ,
साहित्यकार को ,
और दे दी गई ,
इक स्वर्ण जड़ित ,
कलम भी ,
सम्मान राशि के साथ !
रुक जाता ,
लिखते लिखते ,
उनका हाथ ,
जब भी चाहते ,
लिखना वो ,
जनता के दुःख दर्द की ,
कोई बात !
शायद इसलिये  ,
या फिर अनजाने में ही ,
मुझे भेज दी ,
उन्होंने वही कलम ,
शुभकामना के साथ !
देखा भीतर से ,
जब कलम को ,
लगे कांपने मेरे भी हाथ ,
आया नज़र ,
स्याही की जगह लहू ,
डरा गई मुझको ये बात !
ऐसी ही कलमें ,
आजकल लिख रहीं हैं  ,
नित नया नया इतिहास ,
गरीबों के खून के छींटे  ,
आ रहे नज़र ,
उनके दामन पर ,
जो करते तो हैं ,
देशसेवा की बातें  ,
कर रहे हर दिन ,
जनता का धन बर्बाद ! !
आयोजित करते ,
आडम्बरों के समारोह  ,
प्रतिदिन शान दिखाने ,
दिल बहलाने को ,
नहीं कर पाते ,
वो लोग कभी ,
गरीबों के दुःख दर्द का ,
कोई एहसास ! !
करते जिन की हैं बातें ,
उन भूखे नंगों का ,
कर रहे ये कैसा उपहास ! !
कौन दिखाये ,
दर्पण उनको ,
कौन लगाये ,
उन पर कोई आरोप ,
जब शामिल हैं ,
इनमें ,
समाज को ,
आईना दिखाने वाले ,
अपनी सूरत ,
देखें कैसे दर्पण में ,
और कैसे सब को दिखायें ,
सरकारी सम्मानों का ,
क्या है सच ,
वो हमें कैसे खुद बतायें  !! 

ठंडी ठंडी छाँव ( कविता ) 6 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

घर के आंगन का वृक्ष हूं मैं ,
मेरी जड़ें गहराई तक फैली हैं ,
अपनी माटी में ,
प्यार से सालों साल सींचा है ,
माली ने पाला है जतन से ,
घर को देता हूं छाया मैं !!
आये हो घर में तुम अभी अभी ,
बैठो मेरी शीतल शीतल छांव में ,
खिले हैं फूल कितने मुझ पर ,
निहारो उनको प्यार से ,
तोड़ना मत , मसलना नहीं ,
मेरी शाखों , पत्तों , कलियों को ,
लगेंगे फल जब इन पर ,
घर के लिये  , तुम्हारे लिये  ,
करो उसका अभी इंतज़ार !!
काटना मत मुझे कभी भी ,
जड़ों से मेरी ,
जी नहीं सकूंगा  ,
इस ज़मीन को छोड़ कर ,
मैं कोई मनीप्लांट नहीं ,
जिसे ले जाओ चुरा कर ,
और सजा लो किसी नये गमले में !!
देखो मुझ पर बना है घौसला ,
उस नन्हें परिंदे का ,
उड़ना है उसे भी खुले गगन में ,
अपने स्वार्थ के पिंजरे में ,
बंद न करना उसको ,
रहने दो आज़ाद उसको भी घर में ,
बंद पिंजरे में उसका चहचहाना ,
चहचहाना नहीं रह जायेगा ,
समझ नहीं पाओगे तुम दर्द उसका !!
जब भी थक कर कभी ,
आकर बैठोगे मेरी ठंडी ठंडी छांव में ,
माँ की लोरी जैसी सुनोगे ,
इन परिंदों के चहचहाने की आवाज़ों को ,
और यहां चलती मदमाती हवा में ,
आ जाएगी तुम्हें मीठी मीठी नींद !!

Wednesday, 7 November 2012

जीने का अधिकार मिले ( कविता ) शून्य ( डॉ लोक सेतिया )

कोई आस्तिक हो ,
या हो नास्तिक ,
ईश्वर के लिये  ,
सभी हों एक समान ,
होना ही चाहिये  ,
दुनिया का सिर्फ यही विधान !
नहीं जानता मैं क्या हूं ,
आस्तिक या कि नास्तिक ,
शायद नहीं आता मुझको,
करना विनती- प्रार्थना ,
गुलामी करना नहीं भाता मुझे  ,
किसी को गुलाम बनाना ,
भी नहीं चाहता हूं मैं ,
हम सब हैं बराबर जब इंसान ,
किसी का किसी पर ,
नहीं जब कोई एहसान ,
क्यों  होता है  ऐसा फिर भगवान  ,
बेबस ही लगता क्यों  ,
यहां  हर इक इंसान !
चाहता हूं मैं ,
सिर्फ जीने का अधिकार ,
कोई किसी का भी  भक्त नहीं हो  ,
कोई न हो किसी की  सरकार ,
मिले जीने की पूरी कभी तो आज़ादी  ,
आरज़ू है अभी तक ,
बाकी यही आधी ,
सौ साल नहीं ,
उम्र हो चाहे बस इक साल  ,
ज़िंदगी का पर  ,
न हो बुरा ऐसा तो हाल ,
जीना है मुझको अपनी मर्ज़ी से  ,
नहीं और जीना ,
जैसा चाहते हों लोग सारे ,
मर मर कर  ही  ,
अब तक ज़िंदा रहा हूं  ,
कहां एक पल भी जी सका मैं ,
हद हो चुकी है  ,
ज़ुल्मों सितम की  ,
नहीं भीख भी चाहिये  ,
पर तेरे करम की ,
क्यों किसी को ,
अपना मालिक सब मानें  ,
कभी खुद को इंसान  ,
इंसान ही सिर्फ माने  ,
किसी के आदेश से ,
न हो जीना मरना  ,
अगर कर सको ,
अब यही बस तुम करना !!
*******************************
(  भगवान बनना मुश्किल बहुत है //
नहीं आसां मगर इन्सान भी बनना //
कभी तू भी मुझ सा ही बनना !!  )

Sunday, 4 November 2012

मैं ( नज़्म ) शून्य भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मैं कौन हूं ,
न देखा कभी किसी ने //
मुझे क्या करना है ,
न पूछा ये भी किसी ने //
उन्हें सुधारना है मुझको ,
बस यही कहा हर किसी ने !!
और सुधारते रहे ,
मां-बाप कभी गुरुजन //
नहीं सुधार पाए हों दोस्त या कि दुश्मन //
चाहा सुधारना पत्नी ने और मेरे बच्चों ने //
बड़े जतन किए उन सब अच्छों ने //
बांधते रहे रिश्तों के सारे ही बंधन //
बनाना चाहते थे मिट्टी को वो चन्दन //
इस पर होती रही बस तकरार //
मानी नहीं दोनों ने अपनी हार //
सोच लिया मैंने ,
जो कहते हैं सभी //
गलत हूंगा मैं ,
वो सब ही होंगें सही //
चाहा भी तो कुछ कर न सका मैं //
सुधरता रहा ,
पर सुधर सका न मैं !!
बिगड़ा मैं कितना
कितनी बिगड़ी मेरी तकदीर //
कितने जन्म लगेंगें ,
बदलने को मेरी तस्वीर //
जैसा चाहते हैं सब ,
वैसा तभी तो मैं बन पाऊं //
पहले जैसा हूं ,
खत्म तो हो जाऊं //
मुझे खुद मिटा डालो ,
यही मेरे यार करो //
मेरे मरने का वर्ना
कुछ इंतज़ार करो !!

स्वीकार करने अपने गुनाह ( नज़्म ) 6 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

स्वीकार करने हैं ,
सभी अपने गुनाह ,
तलाश करता हूं ,
ऐसी इक इबादतगाह !
मेरी ज़ुबां से सुने ,
मेरी ही दास्तां ,
बन कर के पादरी ,
जहां पर खुद खुदा !!
मंज़ूर है मुझको ,
हर इक कज़ा ,
मांग लूंगा मैं ,
अपने सब जुर्मों की सज़ा !!
पूछना है लेकिन ,
इक सवाल भी मुझे ,
मिलता क्या है ,
हमें रुला के तुझे !!
तेरे ही बंदे ,
क्यों इतने परेशान हैं ,
हम सभी देख कर ,
हैरान हैं ,
मंदिर सब तेरे ,
बने आलीशान हैं ,
फिर किसलिये बेघर ,
इतने इंसान हैं !!
बना कर ये दुनिया ,
कहां खो गया है ,
देख खोल कर आंखें ,
क्या सो गया है !!

ग़ज़ल 1 6 0 ( दौलतों से बड़ी मुहब्बत है )

दौलतों से बड़ी मुहब्बत है ,
अब सभी की हुई ये हालत है !
बेचते हो ज़मीर तक अपना ,
देशसेवा नहीं तिजारत है !
इक तमाशा दिखा लगे कहने ,
देख लो हो चुकी बगावत है !
आईना हम किसे दिखा बैठे ,
यार करने लगा अदावत है !
आज दावा किया है ज़ालिम ने ,
उसके दम पर बची शराफत है !
दोस्त कोई कभी तो मिल जाये  ,
इक ज़रा सी यही तो हसरत है !
आप गैरों को चाहते लेकिन ,
आपसे ही हमें तो उल्फत है !
जब बुलाएं कभी ,नहीं आते ,
दूर से देखने की आदत है !
राह देखा किये वही "तनहा" ,
बदलना राह उनकी फितरत है !

Saturday, 3 November 2012

ग़म हमारे कोई भुला जाये ( नज़्म ) 4 2 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

ग़म हमारे कोई भुला जाये  ,
मुस्कुराना हमें सिखा जाये  !
कोई अपना हमें बना जाये  ,
दिल हमारा किसी पे आ जाये  !
ज़िंदगी खुद ही एक दिन चल कर ,
ग़म के मारों से मिलने आ जाये  !
मुस्कुराते हैं फूल कांटों में ,
राज़ इसका कोई बता जाये  !
रह के दिन भर मेरे ख्यालों में ,
रात सपनों में कोई आ जाये  !

कागज़ के फूल सजाने के ( नज़्म ) 4 0 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

कागज़ के फूल सजाने के ,
अंदाज़ न सीखे ज़माने के !
आये वो ,रस्म निभा के चले ,
अरमान जिन्हें थे बुलाने के !
बेबात ही हम से हैं वो खफा ,
उन के हैं ढंग सताने के !
मसरूफ थे या वादा भूले ,
अच्छे हैं बहाने ,न आने के !
पत्थर दिल के ये आज सभी ,
बन बैठे खुदा बुतखाने के !

हक तो जीने का नहीं है कोई ( नज़्म ) 3 9 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

हक़ तो जीने का नहीं है कोई ,
फिर भी जीता ही कहीं है कोई !
आह भरना भी जहां होता गुनाह ,
रोया जा-के वहीं है कोई !
मौत की मिलके दुआएं मांगें ,
अब इलाज इसका नहीं है कोई !
आएगा वो मेरी मैयत पे ज़रूर ,
कब कहीं आता युंहीं है कोई !
किसको ढूंढे है नज़र ,सहरा में ,
मिलता कब "तनहा" कहीं है कोई !

Friday, 2 November 2012

मन मोहना बड़े झूठे ( हास्य व्यंग्य कविता ) 12 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

चेहरे का उनके ,
रंग,
पहले से था काला।
कालिख लगा सका न ,
कोयला घोटाला !
सबक सिखा गया ,
इमानदार अफसर को ,
मुजरिम नहीं ,
मंत्री जी का है साला !
घोटाले करने वाले ,
बरी हो जाएंगे सब ,
हुआ है कभी साबित ,
यहां पर कोई घोटाला !
हुड़दंग करने की ,
संसद में इजाज़त है ,
लगा लो अदालत में ,
मुहं पर मगर ताला !
फ़िल्मी सितारों से ,
डाकू लुटेरों तक ,
सत्ता की राजनीति  ,
सब की हो गई खाला !
मनमोहन कहते ,
डरना न आरोपों से ,
दिन चार बाद ,
होगा ही अब उठाला !
भाई भाई हैं  ,
पक्ष-विपक्ष के सब नेता ,
खंजर भी छिपा है ,
हाथों में है फूलमाला !
वो भी बिके हुए ,
ये भी बिके हुए ,
दोनों को चलाता सदा ,
इक ही पैसे वाला ! 

गुठलियाँ नहीं आम खाओ ( व्यंग्य कविता ) 1 1 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

गुठलियाँ खाना छोड़ कर ,
अब आम खाओ ,
देश के गरीबो ,
मान भी जाओ !
देश की छवि बिगड़ी ,
तुम उसे बचाओ ,
भूख वाले आंकड़े ,
दुनिया से छुपाओ !
डूबा हुआ क़र्ज़ में ,
देश भी है सारा ,
आमदनी नहीं तो ,
उधार ले कर खाओ !
विदेशी निवेश को ,
कहीं से भी लाओ ,
इस गरीबी की ,
रेखा को बस मिटाओ !
मान कर बात ,
चार्वाक ऋषि की ,
क़र्ज़ लेकर सब ,
घी पिये  जाओ !
अब नहीं आता ,
साफ पानी नल में ,
मिनरल वाटर पी कर ,
सब काम चलाओ !
होना न होना ,
तुम्हारा एक समान ,
सारे जहां से अच्छा ,
गीत मिल के गाओ !       





Thursday, 1 November 2012

अपने ही संग ( कविता ) 6 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

रुको जानो स्वयं को ,
किसलिए खो बैठे हो ,
अस्तित्व अपना ,
भागते रहोगे कब तक ,
झूठे सपनों के पीछे तुम !
देखो ,कोई पुकार रहा है ,
आज तुम्हें ,
तुम्हारे ही भीतर से ,
तलाश करो कौन है वो ,
मिलेगा तुम्हें नया सवेरा ,
नई मंज़िल ,
एक नया क्षितिज ,
एक किनारा !
देखो तुम्हारे अंदर है ,
परिंदा एक जो व्याकुल है ,
गगन में उड़ने के लिये ,
स्वयं को स्वतंत्र कर दो ,
निराशा के इस पिंजरे से ,
फिर से इक बार करो  ,
जीने की नई पहल !
भुला कर दुःख दर्द को ,
खोलो खुशियों का दरवाज़ा ,
छुड़ा अपना दामन ,
परेशानियों से ,
सजा लो अधरों पर मुस्कान !
पौंछ कर ,
अपनी पलकों के आंसू ,
आरम्भ करो फिर से जीना ,
अपने ढंग से ,
अपने ही लिये  ! !
देखना कोई ,
होगा हर कदम ,
साथ साथ तुम्हारे ,
नज़र आये चाहे  नहीं ,
करते रहना ,
उसके करीब होने का ,
आभास पल पल तुम !!

मेरे पत्र ( कविता ) 6 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मेरे बाद मिलेंगे तुम्हें,
मेरे ये पत्र मेज़ की दराज से,
शायद हो जाओ पढ़ कर हैरान ,
मत होना लेकिन परेशान !
लिखे हैं किसके नाम  ,
सोचोगे बार बार तुम,
मैं था सदा से सिर्फ तुम्हारा ,
पाओगे यही हर बार तुम !
हर पत्र को पढ़कर तुम तब ,
सुध बुध अपनी खोवोगे,
करोगे मन ही मन मंथन ,
और जी भर के रोवोगे !
मैंने तुमको जीवन प्रयन्त ,
किया है टूट के प्यार,
कर नहीं सका कभी भी ,
चाह कर भी मैं इज़हार !
कर लेना तुम विश्वास तब ,
मेरे इस प्यार का तुम,
किया उम्र भर जो मैंने ,
उस इंतज़ार का तुम !!

हवाओं को महका दो ( नज़्म ) 3 8 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

हवाओं को महका दो ,
फज़ाओं को बतला दो !
बरसती रहें शब भर ,
घटाओं को समझा दो !
उठा कर के घूंघट को ,
ज़रा सा तो सरका दो !
तुम्हें देखता रहता ,
ये दर्पण भी हटवा दो !
खुली छोड़ कर जुल्फें ,
हमें आज बहका दो !
हमें तुम कभी "तनहा" ,
किसी से तो मिलवा दो !