Tuesday, 30 October 2012

शून्यालाप ( कविता ) 6 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

अंतिम पहर जीवन का ,
समाप्त हुआ अब बनवास ,
त्याग कर बंधन सारे ,
चल देना है अनायास ,
कोई राह नहीं, कुछ चाह नहीं ,
समाप्त हुआ वार्तालाप !!
विलीन हो रही आस्था ,
टूट रहा हर विश्वास ,
तम ने निगल लिया सूरज ,
जाने कैसा है अभिशाप !!
फैला है रेत का सागर ,
जल रहा तन मन आज ,
शब्द स्तुति के सब बिसरे ,
छूट गया प्रभु का साथ ,
मनाया उम्र भर तुमको ,
माने न तुम कभी मगर ,
खो जाना एक शून्य में ,
बनाना है शून्य को वास !!
अब खोजना नहीं किसी को ,
न आराधना की है आस ,
करना है समाप्त अब ,
खुद से खुद का भी साथ !!

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