Sunday, 7 October 2012

समझना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 5 1 भाग दो

समझता हूं मेरे पास सब कुछ है ,
समझना है नहीं कुछ भी पास मेरे !
समझता हूं बहुत कुछ जनता हूं  ,
समझना है नहीं मैं जानता कुछ भी !
समझता हूं खुद को बलशाली बहुत  ,
समझना है बड़ा ही  कमज़ोर हूं मैं  !
समझता हूं मेरे साथी है कितने  ,
समझना है नहीं अपना है कोई  !
समझता हूं अपने आप को दाता ,
समझना है हूं मैं बस इक भिखारी !
समझता हूं कर सकता सभी कुछ ,
समझना है नहीं कुछ हाथ में मेरे !
समझता हूं मेरा दुश्मन ज़माना है ,
समझना है खुद ही अपना हूं दुश्मन !
समझता हूं मेरे हैं राज़दार कितने ,
समझना है नहीं हमराज़ ही कोई !
समझता हूं  मैं ज़िंदा आदमी हूं ,
समझना है  होती ज़िंदगी क्या है !
समझता हूं ,समझ पाता नहीं हूं ,
समझना है अभी मुझको क्या क्या ! !

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