Sunday, 7 October 2012

प्यार की आरज़ू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 8 भाग एक

बहार की करते करते आरज़ू ,
मुरझा गए सब चमन के फूल ,
खिज़ा के दिन हो सके न कम  ,
यूं जिए हैं उम्र भर हम !!
हमने तो इंतज़ार किया ,
उनके वादे पे एतबार किया ,
हम हैं उनके और वो हमारे हैं ,
पर इक नदी के दो किनारे हैं !!
सब को हर चीज़ नहीं मिलती ,
नादानी है चाँद छूने की तमन्ना ,
हमीं न समझे इतनी सी बात ,
कि ज़िंदगी है यूं ही चलती !!
प्यार की जब कभी बात होती है ,
आती हैं याद बातें तुम्हारी ,
इक खुशबू सी महकती है ,
चांदनी जब भी रात होती है !!  

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