Wednesday, 31 October 2012

तुम्हारी नज़रें ( कविता ) 6 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

जानते नहीं ,
पहचानते नहीं ,
जुबां से कह न सके ,
तुमने माना भी नहीं  !!
अजनबी बन गये हो तुम ,
मुझे भी मालूम न था ,
लेकिन ,
मेरे बचपन के दोस्त  ,
छिप सकी न ये बात ,
तुम्हारी उन नज़रों से ,
जो पहचानती थी मुझे ! !
तुम अब तक ,
नहीं सिखा सके ,
उन्हें बदल जाना ,
तभी तो पड़ गया आज ,
तुम्हें ,
मुझसे नज़रें चुराना !!  

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