Monday, 8 October 2012

नये चलन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया -- 5 2 भाग दो

छोड़ गये डूबने वाले का हाथ ,
लोग सब कितने समझदार हैं !
हैं यही बाज़ार के दस्तूर अब ,
जो बिक गये वही खरीदार हैं !!
जीते भी, मरते भी उसूलों पर थे ,
न जाने होते वो कैसे इंसान थे !
उधर मोड़ लेते हैं कश्ती का रुख ,
जिधर को हवा के अब आसार हैं !!
किया है वादा, निभाना भी होगा ,
कभी रही होंगी ऐसी रस्में पुरानी !
साथ जीने और मरने की कसमें ,
आजकल लगती सबको बेकार हैं !!
लोग अजब ,अजब सा शहर है ,
देखते हैं सुनते हैं बोलते नहीं हैं  !
सही हुआ, गलत हुआ, सोचकर ,
न होते कभी भी खुद शर्मसार हैं !!   

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