Thursday, 25 October 2012

तुम मेरे ग़म में शामिल नहीं हो ( नज़्म ) 3 7 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

तुम मिरे ग़म में शामिल नहीं हो ,
इक तुम्हीं मुझ को हासिल नहीं हो !
जान कुर्बान की जिस ने तुम पर ,
कैसे तुम उसके कातिल नहीं हो !
जो कहे आईना ,मान लेंगे ,
तुम मुहब्बत के काबिल नहीं हो !
जान पाओगे तुम खुद को क्योंकर ,
खुद ही अपने मुक़ाबिल नहीं हो !
दिल पे गुज़रती है जो बेरुखी से ,
उस से तुम भी तो गाफ़िल नहीं हो !
बेमुरव्वत हो ऊपर से लेकिन ,
सच कहो साहिबे-दिल नहीं हो !
तुम ज़रा अपने दिल से ये पूछो ,
मेरी कश्ती के साहिल नहीं हो !
देख कर तुमको ये सोचता हूं ,
क्या तुम्ही मेरी मंज़िल नहीं हो !

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