Tuesday, 23 October 2012

अभी और कितने स्मारक ( कविता ) 5 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

वसूला गया होगा ,
गरीब जनता से कर ,
भरने को खजाना  उस बादशाह का ,
जिसने बेरहमी से किया होगा ,
खर्च जनता की अमानत को ,
बनवाने के लिये ,
अपनी प्रेमिका की याद में ,
ताजमहल उसके मरने के बाद !!
कितने ही मजदूरों ,
कारीगरों का बहा होगा पसीना ,
घायल हुए होंगे उनके हाथ ,
तराशते हुए पत्थर ,
नहीं लिखा हुआ ,
उनका नाम कहीं पर।
क्यों करे कोई याद ,
उन गरीबों को , बदनसीबों को ,
देखते हुए ताज ,
यही सोच रहा हूं मैं आज !!
कुछ और सोचते होगे तुम ,
मेरे करीब खड़े होकर ,
जानता हूं वो भी मैं , साथी मेरे ,
रश्क हो रहा है मुमताज से तुम्हें ,
नाज़ है ,
इक शहंशाह के ऐसे प्यार पर तुमको।
खुबसूरत लग रहा है नज़ारा तुम्हें ,
भर लेना चाहते हो उसे आंखों में ,
यादों में बसाने के लिये  ,
अपने प्यार के लिये ,
मांगने को दुआएं ,
उठा रखे हैं दोनों हाथ तुमने ,
कर रहे हो वादा ,
फिर एक बार ,
किसी को लेकर साथ आने का !!
अब तलक चला आ रहा है चलन वही ,
शासकों का उनके बाद ,
उनके नाम स्मारक बनवाने का ,
जनता के धन से सरकारी ज़मीन पर ,
बनाई जाती हैं ,
सत्ताधारी नेताओं के पूर्वजों की समाधियां।
नियम कायदा कानून ,
सब है इनके लिये  ,
आम जनता के लिये  ,
नहीं बनता कभी ऐसा आशियाना ,
जिन्दा लोग ,
नहीं प्राथमिकता सरकार के लिये ,
मोहरे हैं हम सब ,
उनकी जीत हार के लिये। 
लोकतंत्र में पीछे रह गये सब लोग ,
देश पर बोझ बन गये  ,
ये सब के सब राजनेता लोग ,
जब इस बार चढ़ाना ,
किसी समाधि पर फूल ,
सोचना रुक कर वहां एक बार ,
क्या थी उनकी विचारधारा ,
क्या है हमको वो स्वीकार।
जो कहलाते जनता के हितचिन्तक ,
उनके नाम बनाई जाएं समाधियां ,
और जनता रहे बेघर-बार ,
करना ही होगा कभी तो विचार !!

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