Friday, 12 October 2012

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया - 2 4 भाग एक

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे ,
मौत दे मुझको मगर ऐसी सज़ा न दे !
उम्र भर चलता रहा हूं शोलों पे मैं ,
न बुझा इनको ,मगर अब तू हवा न दे !
जो सरे आम बिके नीलाम हो कभी ,
सोने चांदी से तुले ऐसी वफ़ा न दे !
आ न पाऊंगा यूं तो तिरे करीब मैं ,
मुझको तूं इतनी बुलंदी से सदा न दे !
दामन अपना तू कांटों से बचा के चल ,
और फूलों को कोई शिकवा गिला न दे !
किस तरह तुझ को सुनाऊं दास्ताने ग़म ,
डरता हूं मैं ये कहीं तुझको रुला न दे !
ज़िंदगी हमसे रहेगी तब तलक खफा ,
जब तलक मौत हमें आकर सुला न दे !

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