Friday, 12 October 2012

हदिसे दिल पे आते रहे ( नज़्म ) 2 6 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

हादिसे दिल पे आते रहे ,
दास्तां हम सुनाते रहे !
बेगुनाही भी थी इक खता ,
हम सज़ा जिसकी पाते रहे !
मौत हमसे रही दूर ही ,
लाख हम ज़हर खाते रहे !
हमने सपने संजोए थे जो ,
ज़िंदगी भर रुलाते रहे !
तंग आकर करूं ख़ुदकुशी ,
लोग इतना सताते रहे !
दिल बहल जाये ,कुछ ,इसलिये  ,
शायरी में लगाते रहे !

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