Sunday, 14 October 2012

ग़ज़ल 8 9 ( इंसान बेचते हैं ,भगवान बेचते हैं )

इंसान बेचते है ,भगवान बेचते हैं ,
कुछ लोग चुपके चुपके ईमान बेचते हैं !
लो हम खरीद लाये इंसानियत वहीं से ,
हर दिन जहां शराफत शैतान बेचते हैं !
अपने जिस्म को बेचा , उसने जिस्म की खातिर ,
कीमत मिली नहीं पर नादान बेचते है !
सब जोड़ तोड़ करके सरकार बन गई है ,
जम्हूरियत में ऐसे फरमान बेचते हैं !
फूलों की बात करने वाले यहां सभी हैं ,
लेकिन सजा सजा कर गुलदान बेचते हैं !
अब लोग खुद ही अपने दुश्मन बने हुए हैं ,
अपनी ही मौत का खुद सामान बेचते हैं !
सत्ता का खेल क्या है उनसे मिले तो जाना ,
लाशें खरीद कर जो , शमशान बेचते हैं !

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