Sunday, 14 October 2012

ग़ज़ल 4 1 ( जाग जाओ बहुत सो लिये )

जाग जाओ बहुत सो लिये  ,
दिन चढ़ा ,आंख तो खोलिये !
रौशनी कब से है मुन्ताज़िर ,
खिड़कियां ज़ेहन की खोलिये !
बेगुनाही में खामोश क्यों ,
बोलिये और सच बोलिये !
राह में था अकेला कोई ,
बढ़ के साथ उसके हम हो लिये !
हम को कोई न ग़म था मगर ,
ग़म पे औरों के हम रो लिये !
खुद को धोखा न देना कभी ,
आप अपने से सच बोलिये !
ज़िंदगी का करो सामना ,
राज़ "तनहा" सभी खोलिये !

No comments: