Tuesday, 30 October 2012

ग़ज़ल 1 5 9 ( यहाँ रौशनी में छिपे हैं अँधेरे )

यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे ,
कहीं खो गये हैं यहां के सवेरे !
खुली इस तरह से वो जुल्फें किसी की ,
लगा छा गये आज बादल घनेरे !
करें याद फिर से वो बातें पुरानी ,
बने जब हमारे सभी ख़्वाब तेरे !
किया जुर्म हमने मुहब्बत का ऐसा ,
ज़माना खड़ा है हमें आज घेरे !
बचाता हमें कौन लूटा सभी ने ,
बने लोग सारे वहां खुद लुटेरे !
कहीं भी नहीं है हमारा ठिकाना ,
सुबह शाम ढूंढे नये रोज़ डेरे !
दिया साथ सबने ज़रा देर "तनहा" ,
कदम दो कदम सब चले साथ मेरे !

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